Skip to main content

कुछ बेहतरीन कविताएं

कविताएं हर एक व्यक्ति को पसंद होती है। ये अलग बात है कि किसी को प्रेम संबंधी तो किसी को ओज और प्रेरणा दायक कविता पसंद होती है। लेकिन अगर हम कहे कि कोई व्यक्ति ऐसा है जिसे कविता बिलकुल भी पसंद नही तो शायद ये  कथन असंभव सा  होगा। 
   
        विनोद कुमार शुक्ल एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताये हर  वर्ग का व्यक्ति पसंद करता है । इनकी कवितओं में एक तरफ  जहाँ  एक निरीह बच्चे का भाव दिखाई देता है तो दूसरी तरफ जीवन के सत्य जन्म और मृत्यु की  जटिल अभिव्यंजना भी दिखाई देती है। 
                 




कुछ कविताएं~
  
     कौन गाँव का रहने वाला
कहाँ का आदमी कहाँ गया
किसी एक दिन वह आया था
कोई एक दिन रहता था
फिर आएगा किसी एक दिन
किसी गाँव में कुछ दिन
कोई भूल गया था उसको
किसी ने याद किया था।



सौ की गिनती सबको आई
जंगल में था एक शेर
जब अम्मा ने कथा सुनाई
बाकी शेर कितने थे?
बिटिया ने यह बात उठाई
उड़ती चिड़िया को गिनना
तब भी था आसान
जंगल में छुपे घूमते शेरों को
गिनना था कठिन काम
एक शेर सब शेरों जैसा
केवल एक शेर को
यहाँ-वहाँ हर बार
गिना गया था सौ-सौ बार
एक शेर की अम्मा ने भी कथा सुनाई सौ-सौ बार






कोई अधूरा पूरा नहीं होता
और एक नया शुरू होकर
नया अधूरा छूट जाता
शुरू से इतने सारे
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते
परंतु इस असमाप्त –
अधूरे से भरे जीवन को
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं
कि जीवन को भरपूर जिया गया
इस भरपूर जीवन में
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं
एक नई कविता शुरू कर सकता हूं
मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह
किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।



कविता संग्रह-

लगभग जयहिंद ' ,' वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह' वर्ष, ' सब कुछ होना बचा रहेगा ' अतिरिक्त नहीं , कविता से लंबी कविता ', ' आकाश धरती को खटखटाता है '  ' कभी के बाद अभी ' 




 विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं को आप नीचे दिये link पर जाकर भी आसानी से खरीद सकते हैं


Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

हिरोशिमा कविता (अज्ञेय)

कविता: हिरोशिमा (अज्ञेय) एक दिन सहसा सूरज निकला अरे क्षितिज पर नहीं, नगर के चौक : धूप बरसी पर अंतरिक्ष से नहीं, फटी मिट्टी से। छायाएँ मानव-जन की दिशाहिन सब ओर पड़ीं-वह सूरज नहीं उगा था वह पूरब में, वह बरसा सहसा बीचों-बीच नगर के: काल-सूर्य के रथ के पहियों के ज्‍यों अरे टूट कर बिखर गए हों दसों दिशा में। कुछ क्षण का वह उदय-अस्‍त! केवल एक प्रज्‍वलित क्षण की दृष्‍य सोक लेने वाली एक दोपहरी। फिर? छायाएँ मानव-जन की नहीं मिटीं लंबी हो-हो कर: मानव ही सब भाप हो गए। छायाएँ तो अभी लिखी हैं झुलसे हुए पत्‍थरों पर उजरी सड़कों की गच पर। मानव का रचा हुया सूरज मानव को भाप बनाकर सोख गया। पत्‍थर पर लिखी हुई यह जली हुई छाया मानव की साखी है।

Urdu Shayar

      शुरुआती जीवन  इंशा का जन्म जालंधर जिले , पंजाब , भारत के फिल्लौर तहसील में हुआ था।   उनके पिता राजस्थान से थे।   1946 में , उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त की और बाद में 1953 में कराची विश्वविद्यालय से एमए किया। वह रेडियो पाकिस्तान , संस्कृति मंत्रालय और पाकिस्तान के राष्ट्रीय पुस्तक केंद्र सहित विभिन्न सरकारी सेवाओं से जुड़े रहे।   1940 के दशक के उत्तरार्ध में , इब्न - ए - इंशा लाहौर में प्रसिद्ध फिल्म कवि साहिर लुधियानवी के साथ भी एक साथ रहे थे।   वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन में भी सक्रिय थे।   इब्न - ए - इंशा ने 11 जनवरी 1978 को हॉजकिन के लिम्फोमा से मरने से पहले अपना शेष जीवन कराची में बिताया था , जबकि वह लंदन में थे।   बाद में उन्हें कराची , पाकिस्तान में दफनाया गया। साहित्यिक कैरियर इंशा को उनकी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ कवियों और लेखकों में से एक माना जाता है।     इब्न - ए...

तमस उपन्यास की समीक्षा

भीष्म साहनी का उपन्यास तमस 1973 जाति-प्रेम, ,संस्कृति,परंपरा,इतिहास और राजनीति जैसी संकल्पनाओं की आड़ में शिकार खेलनेवाली शक्तियों के दुःसाहस भरे जोखिमों को खुले तौर पर प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक ने 1947 ई. के मार्च-अप्रैल में हुए भीषण साम्प्रदायिक दंगे की पांच दिनों की कहानी इस रूप में प्रस्तुतु की है कि हम देश-विभाजन के पूर्व की सामाजिक मानसिकता और उसकी अनिवार्य परिणति की विभीषिका से पूरी तरह परिचित हो जाएं। उपन्यास के पात्रों महेताजी, वानप्रस्थी,जनरैल,बख्शी जी,नत्थू, मुरादली,देवव्रत,रणवीर, आदि के माध्यम से भीष्म साहनी फिरकापस्ति, कट्टरधर्मिता, और धर्मान्धता आदि की मनःस्थितियों कर सामाजिक संदर्भों को पर्त दर पर्त उघाड़ते हैं।     हिन्दू या मुसलमान इतने कट्टर हो सकते हैं,इसकी सहज रूप से कल्पना भी नही की जा सकती। कट्टर हिंदूवाद की बखिया उघाड़ती भीष्म जी की भाषा शैली उस वातावरण का सफल चित्रांकन करती है।     उपन्यास का प्रारंभ नत्थू चमार के एक बदरंग और मोटे सुअर को मारने की लंबी उबाऊ और थका देने वाली प्रक्रिया से होता है। उसे बाद में मस्जिद के बाहर फिंकवा दिया जाता है, ...